नई दिल्ली : “मूल निवासी कौन है?” यह सवाल आज भारत की सामाजिक और राजनीतिक बहसों में बार-बार सुनाई देता है। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक “मूल निवासी”, “आदिवासी”, “देशज” और “स्वदेशी” जैसे शब्दों का इस्तेमाल बढ़ा है। लेकिन इन शब्दों की जड़ें कितनी पुरानी हैं ? दुनिया में “Indigenous” शब्द का इस्तेमाल कब शुरू हुआ ? यह शब्द केवल पहचान का परिचय रहा या बाद में भूमि, संस्कृति और राजनीतिक अधिकारों के आंदोलनों का आधार बना ? और भारत में “मूल निवासी” की अवधारणा का क्या अर्थ है ?
इन सवालों का जवाब इतिहास, भाषा और अंतरराष्ट्रीय कानून—तीनों को साथ रखकर ही समझा जा सकता है।
‘Indigenous’ शब्द की शुरुआत कहां से हुई?
अंग्रेजी का Indigenous शब्द लैटिन के indigena से निकला है। इसका मूल अर्थ था—किसी स्थान पर जन्मा या उस स्थान का देशज व्यक्ति। Oxford के अनुसार indigenous की व्युत्पत्ति लैटिन indigena से हुई है।
इसके आधुनिक यूरोपीय इस्तेमाल का इतिहास हालांकि एकदम सीधी रेखा में नहीं चलता। कुछ शोधों के अनुसार अंग्रेजी में इसका शुरुआती प्रमाण 1588 में मिलता है। दूसरी ओर, कुछ इतिहासकार बताते हैं कि इससे संबंधित शब्द 15वीं और 16वीं सदी के यूरोपीय शब्दकोशों में पहले ही दिखाई देने लगे थे। इसलिए “दुनिया में पहली बार इसी तारीख को मूल निवासी शब्द इस्तेमाल हुआ” कहना ऐतिहासिक रूप से सावधानी के बिना सही नहीं होगा।
यानी इसकी भाषाई जड़ प्राचीन है, लेकिन आधुनिक राजनीतिक अर्थ अपेक्षाकृत नया है।
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| AI से प्रतीकात्मक चित्र |
शब्द से राजनीतिक पहचान तक का सफर
शुरुआती दौर में “indigenous” का अर्थ मुख्यतः किसी क्षेत्र के देशज या स्थानीय लोगों से था। लेकिन यूरोपीय औपनिवेशिक विस्तार के दौरान यह शब्द अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अन्य क्षेत्रों की उन आबादियों के संदर्भ में अधिक महत्वपूर्ण हो गया, जिनकी भूमि पर औपनिवेशिक शक्तियों ने अपना नियंत्रण स्थापित किया।
धीरे-धीरे “हम यहां पहले से रहते आए हैं” का सवाल भूमि, संसाधन, संस्कृति और राजनीतिक अधिकारों से जुड़ने लगा।
यहीं से “मूल निवासी” केवल भौगोलिक पहचान नहीं रहा, बल्कि अधिकारों की भाषा बनने लगा।
दुनिया में Indigenous Peoples का आधुनिक आंदोलन
20वीं सदी में विभिन्न देशों के देशज समुदायों ने संगठित होकर अपने अधिकारों की मांग तेज की।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 1923 में Haudenosaunee नेता Deskaheh जेनेवा पहुंचे और अपने लोगों के भूमि, कानून और स्वशासन के अधिकार की बात रखने की कोशिश की। न्यूजीलैंड के Maori नेता T.W. Ratana ने भी 1920 के दशक में Treaty of Waitangi और Maori भूमि-अधिकारों के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने का प्रयास किया।
यह आधुनिक वैश्विक Indigenous Rights Movement के शुरुआती महत्वपूर्ण पड़ावों में गिना जाता है।
1960 और 1970 का दशक: आंदोलन ने लिया अंतरराष्ट्रीय रूप
1960 और 1970 के दशक में अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और अन्य क्षेत्रों में Indigenous संगठनों का विस्तार हुआ। ILO के अनुसार राष्ट्रीय Indigenous संगठन विशेष रूप से 1960 के दशक में उभरने लगे, जबकि World Council of Indigenous Peoples और International Indian Treaty Council जैसे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क 1970 के दशक में सक्रिय हुए।
इस दौर में मांग केवल सांस्कृतिक पहचान की नहीं थी।
प्रमुख मुद्दे थे—
भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार
जबरन विस्थापन का विरोध
अपनी भाषा और संस्कृति की रक्षा
राजनीतिक प्रतिनिधित्व
शिक्षा और स्वास्थ्य
पारंपरिक संस्थाओं की मान्यता
विकास परियोजनाओं में स्थानीय समुदायों की सहमति और भागीदारी
यानी “Indigenous” शब्द धीरे-धीरे अधिकारों और न्याय की अंतरराष्ट्रीय भाषा बन गया।
संयुक्त राष्ट्र में Indigenous Rights की बड़ी शुरुआत
संयुक्त राष्ट्र में Indigenous peoples का मुद्दा औपचारिक रूप से 1970 के दशक में महत्वपूर्ण रूप से सामने आया। संयुक्त राष्ट्र के इतिहास के अनुसार 1970 में Indigenous populations के खिलाफ भेदभाव के अध्ययन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया।
इसके बाद 1982 में UN Working Group on Indigenous Populations की स्थापना हुई। इसी प्रक्रिया ने आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर Indigenous Peoples के अधिकारों के लिए व्यापक मानकों के निर्माण का रास्ता खोला।
ILO Convention 107 और फिर Convention 169
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर Indigenous और Tribal peoples के अधिकारों को लेकर ILO Convention No. 107, 1957 पहला प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समझौता था।
लेकिन बाद में इसकी आलोचना हुई क्योंकि उसमें उस समय की “integration” या मुख्यधारा में विलय की सोच दिखाई देती थी।
इसीलिए 1989 में ILO Convention No. 169 अपनाया गया। इसमें Indigenous और Tribal peoples की अपनी संस्थाओं, जीवन-पद्धति, पहचान, भाषा और विकास की प्राथमिकताओं के सम्मान तथा निर्णयों में भागीदारी पर जोर दिया गया।
यह बदलाव बहुत महत्वपूर्ण था।
पहले सवाल का स्वर था—
“इन समुदायों को मुख्य समाज में कैसे शामिल किया जाए?”
बाद की सोच ने सवाल बदला—
“इन समुदायों की अपनी पहचान, अधिकार और निर्णय लेने की क्षमता का सम्मान कैसे किया जाए ?”
2007: Indigenous Rights का ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज
13 सितंबर 2007 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने United Nations Declaration on the Rights of Indigenous Peoples (UNDRIP) को अपनाया।
इस घोषणा ने Indigenous peoples के अधिकारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत किया। इसमें संस्कृति, पहचान, भूमि, संसाधन, स्वशासन, भागीदारी और विकास से जुड़े अधिकारों पर जोर दिया गया।
यहीं से “Indigenous” शब्द का आधुनिक अर्थ और अधिक स्पष्ट हो गया—यह केवल “यहां रहने वाला पुराना व्यक्ति” नहीं बल्कि ऐसे समुदायों की सामूहिक पहचान से जुड़ गया जिनके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संबंध किसी क्षेत्र से गहरे रहे हैं।
भारत में ‘मूल निवासी’ की बहस क्यों अलग है?
भारत का मामला दुनिया के कई औपनिवेशिक देशों से अलग और अधिक जटिल है।
भारत में अलग-अलग समुदाय हजारों वर्षों से एक-दूसरे के संपर्क, प्रवास, संघर्ष, विवाह और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में रहे हैं। इसलिए किसी एक आधुनिक समुदाय को पूरे भारतीय उपमहाद्वीप का “एकमात्र मूल निवासी” घोषित करना इतिहास और आनुवंशिकी—दोनों को अत्यधिक सरल बना देना होगा।
यही कारण है कि भारत में “Indigenous” की अंतरराष्ट्रीय अवधारणा को लेकर लंबे समय से अलग दृष्टिकोण रहा है। ILO के दस्तावेज में भी भारत की उस स्थिति का उल्लेख मिलता है जिसमें किसी एक आबादी को दूसरी से पहले की “पूर्ववर्ती” आबादी मानने की धारणा पर आपत्ति जताई गई है।
भारत में ‘आदिवासी’ शब्द और आधुनिक राजनीति
भारत में “आदिवासी” शब्द की आधुनिक राजनीतिक पहचान मुख्यतः 20वीं सदी में विकसित हुई। विशेष रूप से 1930 के दशक में जनजातीय आंदोलनों के साथ इस शब्द का राजनीतिक इस्तेमाल अधिक स्पष्ट हुआ।
यहां “आदिवासी” का प्रयोग अनेक समुदायों ने अपनी पहचान, भूमि-अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग के संदर्भ में किया।
लेकिन एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि भारतीय संविधान ने “मूल निवासी” को कोई अलग संवैधानिक नागरिक श्रेणी नहीं बनाया। संविधान में Scheduled Tribes यानी अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक व्यवस्था है।
इसलिए “आदिवासी”, “मूल निवासी” और “अनुसूचित जनजाति” तीनों शब्दों को हर जगह समान अर्थ में इस्तेमाल करना कानूनी और ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है।
क्या ‘मूल निवासी’ शब्द दूसरों को नीचा दिखाने का हथियार बन गया है?
यहीं आज की सबसे महत्वपूर्ण बहस शुरू होती है।
किसी समुदाय द्वारा स्वयं को “मूल निवासी” कहना उसके ऐतिहासिक अनुभव, सांस्कृतिक पहचान और अधिकारों की अभिव्यक्ति हो सकता है। यह अपने आप में किसी दूसरे समुदाय का अपमान नहीं है।
समस्या तब उत्पन्न होती है जब “मूल निवासी” को श्रेष्ठता का प्रमाणपत्र और “बाहरी” को कमतर नागरिक साबित करने का हथियार बना दिया जाता है।
किसी व्यक्ति की जाति, भाषा, धर्म या सामाजिक पहचान के आधार पर उसे “मूल” या “बाहरी” बताना न तो इतिहास की जटिलता को स्वीकार करता है और न ही आधुनिक संवैधानिक नागरिकता की समानता को।
अधिकारों की मांग और दूसरे की गरिमा छीनना—दो अलग बातें हैं।
इतिहास को हथियार नहीं, शोध का विषय क्यों बनाना चाहिए?
आज DNA, हड़प्पा सभ्यता, आर्यों का आगमन, आदिवासी इतिहास और “मूल निवासी” जैसे विषय सोशल मीडिया पर अक्सर एक-दूसरे से जोड़ दिए जाते हैं।
लेकिन प्राचीन DNA किसी आधुनिक जाति या समुदाय का सीधा “स्वामित्व प्रमाणपत्र” नहीं होता।
इसी तरह किसी पुरातात्विक स्थल से मिले कंकाल के आधार पर यह कहना कि “यही आज के फलां समुदाय के लोग थे” वैज्ञानिक रूप से बहुत सावधानी मांगता है।
इतिहास में निरंतरता हो सकती है, लेकिन प्राचीन आबादी और आधुनिक सामाजिक पहचान को सीधे एक-दूसरे के बराबर मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।
‘कौन पहले आया’ या ‘किसके अधिकार सुरक्षित हैं’ ?
शायद आधुनिक भारत में बहस का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है।
अगर किसी समुदाय के साथ ऐतिहासिक विस्थापन हुआ है, उसकी जमीन पर कब्जा हुआ है, उसकी भाषा और संस्कृति पर दबाव पड़ा है या उसे राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित किया गया है, तो उसके अधिकारों की रक्षा जरूरी है।
लेकिन इसके लिए दूसरे भारतीय को “विदेशी” या “कम भारतीय” साबित करना आवश्यक नहीं।
लोकतंत्र में अधिकार ऐतिहासिक पीड़ा को स्वीकार करके दिए जा सकते हैं, बिना नागरिकों के बीच श्रेष्ठ और निम्न की दीवार खड़ी किए।
‘मूल निवासी’ सम्मान की पहचान बने, विभाजन की नहीं
“मूल निवासी” की अवधारणा का इतिहास केवल एक शब्द का इतिहास नहीं है। यह औपनिवेशिक विस्तार, भूमि-अधिकार, सांस्कृतिक अस्तित्व, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और मानवाधिकार आंदोलनों से जुड़ा हुआ इतिहास है।
दुनिया में Indigenous Peoples का आधुनिक आंदोलन इस बात की मांग से मजबूत हुआ कि जिन समुदायों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ें किसी क्षेत्र से जुड़ी हैं, उनके अधिकारों और पहचान को नजरअंदाज न किया जाए।
लेकिन यही अवधारणा जब किसी दूसरे समुदाय को नीचा दिखाने, उसकी नागरिकता पर सवाल उठाने या उसे “कमतर” साबित करने के लिए इस्तेमाल होने लगे, तो अधिकार की भाषा विभाजन की भाषा में बदल सकती है।
इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि “भारत का मूल निवासी कौन है?”
सवाल यह भी होना चाहिए—
“इतिहास में किन समुदायों के अधिकार प्रभावित हुए, आज उनके अधिकार कैसे सुरक्षित हों और क्या हम अपनी पहचान का सम्मान करते हुए दूसरे की गरिमा भी बचा सकते हैं?”
यही इतिहास, संविधान और लोकतंत्र—तीनों के बीच संतुलन का रास्ता है।

