अगर इंकबाल का मंजर नहीं देखा तो मुझे देख, तूने अगर समंदर नहीं देखा तो मुझे देख

Thejournalist
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 संपादकीय/Editorial : जब देश में मासूमियत सुरक्षित ना हो, महिलाओं पर हजारों साल पुराने रिवाज के नाम पर बुर्का जैसा प्रतिबंध हों, संविधान दूसरे देशों से लिया गया हो और 200 से अधिक नियम - कानून 21वीं सदी में 18वीं और 19वीं सदी के चल रहे हों देश में मिलावट खोरी की छूट , शिक्षा में मनमानी, सरकारी व संपत्ति पर अवैध कब्जे की छूट, लोगों को फर्जी मुक़दमे में फंसाने की छूट, अंधविश्वास, कौमी उन्माद, धर्मांतरण जबकि कानूनों के जन्मदाता ब्रिटेन द्वारा उन कानूनों को अपने देश में समाप्त कर दिया हो तब UGC जैसे एक्ट देशों के करोड़ों लोगों के साथ भद्दा मज़ाक है भले ही सुप्रीम कोर्ट ने उस पर निषेधाज्ञा लागू कर दी हो फ़िर भी सरकार अपने पक्ष में फैसले करा सकती है मामले को दबाने के लिए ये राजनीतिक खेल चल रहा है सुनवाई मार्च, अप्रैल के महीने में होगी सरकार तब तक विरोध का स्तर देखेगी, कौन से क्षेत्र, राज्य अधिक प्रभावित है विरोध में भीड़ क्या रही, विपक्षी दल विरोध कर नहीं सकते उन्हें अपने वोट खतरे में नहीं डालने हैं उन्हें OBC और SC/ST का विरोधी बता दिया जायेगा, बीजेपी सरकार को कोसने और दिन भर गालियां देने वाले दिलीप सी मंडल जैसे लोगों को UGC एक्ट के प्रतिनिधित्व में शामिल किया गया उन्हें चुप रहने के लिए लाखों का भत्ता दिया जाता है अगर उस कट्टर जातिवादी से कोई कानून बनाने को कहा जायेगा तो वह UGC एक्ट ही बनायेगा , सरकारें सत्ता में बने रहने के लिए किसी एक वर्ग को खुश करने की होड़ में रहती हैं ताकि वोट बैंक संरक्षित रहे लेकिन UGC में ओबीसी, एससी/एसटी, महिलाओं और दिव्यांगों को शामिल किया गया है जिससे 4% से 6% लोगों को जन्मजात अपराधी बना दिया गया है फ़िर भी उन्हें ऐसा करना भी चाहिए सत्ता में बने रहना ही राजनीति का सर्वोच्च उद्देश्य है उसके लिए लोगों को कितना भी उन्मादी, हिंसक, क्रूर बनाना पड़े लेकिन सड़क पर भरी सर्दी के भीख मांगते बच्चे, देश मे अस्पतालों से गायब होते मासूम, महिलाओं के बलात्कारों , शोषण, हिंसा को रोकने के लिए नियमित कदम उठाने की जरूरत है अगर वो ऐसा नहीं करते हैं तो शायद वह देश की 86% जनता को वैसे ही ठगने की कोशिश कर रहे है जैसे एक जादूगर लोगों की आंखों में धूल झोंककर लोगों को वास्तविकता से दूर रखता है



वैसे व्यंग्य को पढ़िए और मौजूदा राजनीति का आनंद लीजिए 

अगर इंकबाल का मंजर नहीं देखा तो मुझे देख ,

तूने अगर समंदर नहीं देखा तो मुझे देख

उम्मीद झांकती है झरोखों से हर सुबह,

तूने अगर मुकद्दर नहीं देखा तो मुझे देख

हर शख्स मर रहा है हर रोज कहीं,

तुमने अगर जिंदा लाशें नहीं देखी तो मुझे देख

ज़मुरियत का दौर है ईमान भी बिकते हैं यहां ,

तूने अगर कूड़ेदान नहीं देखा तो मुझे देख

( लेखक, कवि, व्यंग्यकार , इतिहास, भारतीय राजनीति व कानून के जानकार है अयोध्या में रहते हैं )

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